कल्कि पुराण, यह हमारे धर्म ग्रंथों में एक पुराण (उपपुराण) है। इसमें भगवान विष्णु के दसवें और आखिरी अवतार, यानी कल्कि अवतार के बारे में बताया गया है। इसमें लिखा है कि जब कलियुग का आखिरी समय आएगा (लगभग 4,320वीं सदी के आस-पास), तब भगवान कल्कि धरती पर पाप खत्म करने के लिए जन्म लेंगे। भगवान कल्कि बचपन से ही 64 कलाओं (सब तरह की विद्याओं और ताकतों) में माहिर होंगे। ज्योतिष के हिसाब से ऐसा तभी हो सकता है जब उनके जन्म के समय सारे ग्रह एकदम मजबूत और अपनी सबसे अच्छी पोजीशन में हों।
पंडितों और जानकारों का कहना है कि ग्रहों का ऐसा खास संयोग (जहां गुरु और शनि दोनों एक साथ अपनी सबसे मजबूत राशि में हों) साल 2014 के बाद अब सीधे साल 2599 में बनेगा।
इसका मतलब यह निकलता है कि या तो कल्कि भगवान का जन्म हो चुका है और वो कहीं गुप्त रूप से रह रहे हैं, या फिर वो सीधे साल 2599 के आस-पास जन्म लेंगे।
1. कलयुग का अंत और समय की गणना:
पुराणों में लिखा है कि कलयुग का अंत 4,320वीं सदी (यानी लाखों साल बाद) में होगा, लेकिन ग्रहों का यह खास संयोग अभी 2599 में ही बन रहा है। "देखा जाए तो कलयुग के खत्म होने में तो अभी बहुत लंबा समय बाकी है, लेकिन ज्योतिष के हिसाब से ग्रहों का यह दुर्लभ संयोग बहुत जल्द (2599 में) बन रहा है। तो क्या इसका मतलब यह है कि भगवान का अवतार कलयुग के एकदम अंत में न होकर, बीच में ही धर्म की स्थापना के लिए हो जाएगा?"
पुराणों में संभल गांव का जिक्र है सबसे हैरान करने वाली बात तो हमारे ग्रंथों है। हजारों साल पहले लिख दिया गया कि जब कोई महामानव या अवतार लेगा, तब यूनिवर्स के सारे ग्रह (गुरु, शनि वगैरह) अपनी बेस्ट पोजीशन में होंगे। आज का विज्ञान भी ग्रहों की इस चाल को देखकर हैरान है। चाहे भगवान आ चुके हों या 2599 में आएं, यह बात हर इंसान को एक उम्मीद देती है कि बुराई चाहे कितनी भी बड़ी हो जाए, अंत में जीत अच्छाई की ही होगी।
इस पुराण में प्रथम मार्कण्डेय जी और शुक्रदेव जी के संवाद का वर्णन है। कलयुग का प्रारम्भ हो चुका है जिसके कारण पृथ्वी देवताओं के साथ, विष्णु के सम्मुख जाकर उनसे अवतार की बात कहते है। भगवान विष्णु के अंश रूप में ही सम्भल गांव में कल्कि भगवान का जन्म होता है। उसके आगे कल्कि भगवान की दैवीय गतिविधियों का सुंदर वर्णन मन को बहुत सुंदर अनुभव कराता है।
भगवान् कल्कि विवाह के उद्देश्य से सिंहल द्वीप जाते हैं। वहां जलक्रीड़ाके दौरान राजकुमारी पद्यावती से परिचय होता है। देवी पद्यिनी का विवाह कल्कि भगवान के साथ ही होगा। अन्य कोई भी उसका पात्र नहीं होगा। प्रयास करने पर वह स्त्री रूप में परिणत हो जाएगा। अंत में कल्कि व पद्यिनी का विवाह सम्पन्न हुआ और विवाह के पश्चात् स्त्रीत्व को प्राप्त हुए राजगण पुन: पूर्व रूप में लौट आए। कल्कि भगवान पद्यिनी को साथ लेकर सम्भल गांव में लौट आए। विश्वकर्मा के द्वारा उसका अलौकिक तथा दिव्य नगरी के रूप में निर्माण हुआ।
हरिद्वार में कल्कि जी ने मुनियों से मिलकर सूर्यवंश का और भगवान राम का चरित्र वर्णन किया। बाद में शशिध्वज का कल्कि से युद्ध और उन्हें अपने घर ले जाने का वर्णन है, जहां वह अपनी प्राणप्रिय पुत्री रमा का विवाह कल्कि भगवान से करते हैं।
उसके बाद इसमें नारद जी, आगमन् विष्णुयश का नारद जी से मोक्ष विषयक प्रश्न, रुक्मिणी व्रत का प्रसंग और अंत में लोक में सतयुग की स्थापना के प्रसंग को वर्णित किया गया है। वह शुकदेव जी की कथा का गान करते हैं। अंत में दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी और शर्मिष्ठा की कथा है। इस पुराण में मुनियों द्वारा कथित श्री भगवती गंगा स्तव का वर्णन भी किया गया है। पांच लक्षणों से युक्त यह पुराण संसार को आनन्द प्रदान करने वाला है। इसमें साक्षात् विष्णु स्वरूप भगवान कल्कि के अत्यन्त अद्भुत क्रियाकलापों का सुन्दर व प्रभावपूर्ण चित्रण है। जो कल्कि पुराण का अध्ययन व पठन करते हैं, वे मोक्ष को प्राप्त करते हैं॥ जय कल्कि महाराज
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